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  • जमीन के पेंच में फंसी बीसीसीएल की 10 खदानें, विवाद सुलझा तो सालाना 5.15 लाख टन ज्यादा कोयला मिलेगा

धनबाद6 घंटे पहलेलेखक: संजय मिश्रा

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एकीकृत मुरीडीह परियोजना, यहां कोयला खनन चल रहा है, लेकिन भूमि विवाद के कारण इसका विस्तार रुक गया है।

  • देशभर में कोयले की किल्लत और उससे पैदा हो रहे बिजली संकट के बीच बीसीसीएल की कोयला खदानों पर भास्कर की जांच

पूरे देश में कोयले की कमी है। मांग अचानक बढ़ गई है। कोयले की कमी से बिजली संकट पैदा हो रहा है। वहीं झारखंड में बीसीसीएल की 10 खदानें जमीन विवाद के चलते बंद हैं. यह संख्या चालू खानों की कुल संख्या का एक तिहाई है। यहां वर्षों से विवाद चल रहा है और यह कोयला उत्पादन और बीसीसीएल के प्रेषण के लक्ष्य को प्राप्त करने में बाधा बन गया है। जानकारों का कहना है कि अगर इन खदानों से विवाद सुलझाकर कोयला उत्पादन शुरू किया जाए तो उन्हें सालाना करीब 5.15 लाख टन कोयला मिल सकता है.

यह बिजली संयंत्रों में कोयले की बढ़ती मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। बीसीसीएल की सभी खदानों को 12 क्षेत्रों में बांटा गया है। इनमें सबसे ज्यादा विवाद एरिया-वन और ब्लॉक-टू में है। एरिया-वन के फुलरीटांड कोलियरी और ब्लॉक-टू के केसरगढ़ कोलियरी के बीच विवाद 20 साल से अधिक पुराना है।

इसके साथ ही चांच विक्टोरिया क्षेत्र के दहीबारी व जमागड़िया परियोजनाओं में भूमि विवाद के कारण खनन नहीं किया जा रहा है. ज्यादातर विवाद भूमि अधिग्रहण और अतिक्रमण से जुड़े हैं। मुआवजे और नौकरी की मांग को लेकर रैयत व अतिक्रमणकारियों ने धरना-प्रदर्शन जारी रखा है. कंपनी प्रबंधन भी उनसे बात करता है। अधिकारी आते हैं। वे समझाते हैं लेकिन विवाद का समाधान नहीं हो रहा है।

कुछ परियोजनाओं में विवाद, सुलझाने की कोशिश
कुछ परियोजनाओं में विवाद है। समाधान निकालने का प्रयास किया जा रहा है। कई जगह प्रगति हो रही है। वर्तमान में प्रतिदिन 95 हजार टन का उत्पादन किया जा रहा है। उत्पादन और प्रेषण बढ़ रहा है। -पीएम प्रसाद, सीएमडी, बीसीसीएल

विशेषज्ञ दृष्टिकोण: राकेश कुमार, पूर्व तकनीकी निदेशक, बीसीसीएल

5 साल की जगह एक साल की मंजूरी में शुरू करें खनन, इसलिए उठा विवाद
कोई भी कोयला खनन परियोजना लंबे समय तक चलती है। खनन के लिए परियोजना में कम से कम पांच साल के लिए भूमि की मंजूरी होनी चाहिए। जमीन चाहे सरकारी हो, वन विभाग हो या रैयती, अधिग्रहण में समय लगता है। लेकिन, सरकारें और कोयला कंपनियां खनन को जल्दी शुरू करने के लिए पर्याप्त जमीन हासिल किए बिना ही काम शुरू कर देती हैं।

इससे कुछ महीनों तक उत्पादन सुचारू रहता है। लेकिन, जैसे-जैसे खनन का दायरा बढ़ता है, समस्याएं आने लगती हैं, क्योंकि इसके लिए जमीन साफ ​​नहीं होती है। मानसिकता बदलने की जरूरत है। भूमि अधिग्रहण नीति में बदलाव करना होगा। भूमि एवं राजस्व विभाग को सुदृढ़ करना होगा। लगातार रैयतों और अतिक्रमणकारियों से बात कर समस्या के समाधान का प्रयास करना होगा।

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